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हिमाचल के किसानों ने गुरुकुल कुरुक्षेत्र के कृषि फार्म का किया दौरा

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कम लागत प्राकृतिक कृषि मॉडल को समझा

जनवक्ता डेस्क बिलासपुर
हिमाचल प्रदेश के जिला बिलासपुर के दो दर्जन से अधिक प्रगतिशील किसानों ने मृदा परीक्षण अधिकारी डॉ. प्रकाश ठाकुर की अगुवाई में गुरुकुल कुरुक्षेत्र के कृषि फार्म का दौरा किया। गुरुकुल के प्रधान कुलवन्त सिंह सैनी व सह प्राचार्य शमशेर सिंह के साथ प्रतिनिधिमंडल में शामिल कृषि विशेषज्ञों, किसानों तथा महिलाओं ने कृषि फार्म का अवलोकन करने के बाद यह माना कि राज्यपाल आचार्य देवव्रत गुरुकुल के कृषि फार्म के बारे में जो मंचों के माध्यम से कहते है, वास्तव में यहाँ उस पर अमल हुआ है। वास्तव में गुरुकुल का कृषि फार्म कम लागत प्राकृतिक कृषि का एक अनुपम उदाहरण है। उन्होंने कहा कि वे कम लागत प्राकृतिक कृषि मॉडल को न केवल अपनाएंगे बल्कि जहाँ संभव होगा, लागू करवाने का प्रयास करेंगे। प्रतिनिधि मंडल में महिलाआंे ने भी बढ़-चढ़कर भाग लिया और कम लागत प्राकृतिक खेती के लिए जीवामृत, घनजीवामृत व अन्य उपयोगी उत्पादों में अपनी रूचि व्यक्त की। गुरुकुल के प्रधान कुलवन्त सिंह सैनी, प्राचार्य कर्नल अरुण दत्ता, सह-प्राचार्य शमशेर सिंह ने प्रतिनिधि मंडल में शामिल डॉ. प्रकाश ठाकुर, प्रगतिशील किसान बलदेव, रणवीर, सुखदेव, बीरबल, शंकर, कमला देवी,

रवि देवी, लक्ष्मी देवी, सोमा देवी, मीना ठाकुर, अंजना ठाकुर आदि को आचार्य देवव्रत की प्राकृतिक खेती पर आधारित पुस्तक भेंट की। मौके पर मुख्य लेखा अधिकारी सतपाल सिंह व लिपिक अशोक कुमार भी उपस्थित रहे। सह प्राचार्य शमशेर सिंह ने कहा कि कम लागत प्राकृतिक कृषि ही एक ऐसा विकल्प है जो देश के किसानों को न केवल आर्थिक रूप से सबल बना सकता बल्कि ग्लोबल वार्मिंग के लिए भी आदर्श बन सकता है। कम लागत प्राकृतिक कृषि को देश के किसान बड़े पैमाने पर अपना रहे हैं और बहुत जल्द ही पूरे देश में प्राकृतिक कृषि की इस तकनीक को अपनाया जाएगा। उन्होंने गुरुकुल के फार्म पर खड़ी गन्ना, गेहूं व सब्जियों की फसलों का अवलोकन किया। प्रधान कुलवन्त सिंह सैनी ने कहा कि रासायनिक खेती ने किसान को बरबाद कर दियाहै। इससे न केवल आर्थिक नुकसान होता है बल्कि यूरिया व पेस्टीसाइड, डीएपी के प्रयोग से खेत की उर्वरा शक्ति नष्ट होने के साथ-साथ किसान के खेतों में मौजूद मित्र जीव भी समाप्त हो गये हैं जिस कारण पर्यावरण में असंन्तुलन की स्थिति उत्पन्न हो गई है। साथ ही किसान आर्थिक रूप से पिछड़ता जा रहा है। अब किसानों के पास अपनी आर्थिक व सामाजिक दशा सुधारने का कम लागत प्राकृतिक कृषि ही एकमात्र उपाय है।

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