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इस बार संसदीय चुनाव किसी भी दल के लिए आसान नहीं

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विभिन्न मुद्दों को लेकर जन प्रतिनिधियों को करना पड़ेगा जनता के सवालों का सामना

राजनीतिक संवाददाता बिलासपुर
यद्यपि भाजपा और कांग्रेस दोनों ही दल बड़ी- बड़ी घोषणाओं और आश्वासनों के साथ शीघ्र ही होने वाले 2019 के संसदीय चुनाव में हिमाचल प्रदेश की चारों की चारों संसदीय सीटों को जीत लेने के बड़े-बड़े दावे कर रही हैं , किन्तु न तो अब वह स्थिति है जो वर्ष 2014 के संसदीय चुनाव से पहले कुछ कांग्रेसी नेताओं की भ्रष्टाचार जनित कार्यवाईयों के चलते उसे जनता में अत्यंत अलोकप्रिय बनाए हुए थी और न ही जनता अब भाजपा के उस समय के झांसेपूर्ण वादों में ही विश्वास करने को ही तैयार है , इसलिए अब यद्यपि चुनाव के लिए कुल तीन मास ही शेष बचे हैं , फिर भी दोनों ही दल इस मामले में स्वयं ही परिणाम के प्रति आश्वस्त नहीं हैं | जिसका पता दोनों ही दलों के वरिष्ठ नेताओं के भाषणों की नपी- तुली भाषा और भाषणों से स्पष्ट झलकता है |
यहाँ घंटना क्रम पर बारीकी से नजर रखने वाले और तर्क देकर राजनीतिक विश्लेषण करने वालों का कहना है कि भाजपा की जयराम सरकार और उसके योग्य व अयोग्य मंत्री चाहे कितनी ही डींगें हाँकते फिरें और चाहे प्रधान मंत्री की, करोड़ों रुपए के भारी ब्यय और सरकारी साधनों के बल पर कथित कितनी ही बड़ी बड़ी “अभूतपूर्व उपलब्धियों “ के नाम पर लाखों की भीड़ वाली रेलियाँ आयोजित करती फिरे , किन्तु फील्ड की वास्तविकता उससे बिलकुल भिन्न है, जो उपलब्धियों का डिंढोरा भाजपा पीटती फिर रही है |
राजनैतिक प्रयवेक्षक मानते हैं कि अभी तक तो भाजपा की जयराम सरकार ने ऐसा कुछ भी चमत्कारी या आश्चर्यजनक अथवा प्रभावित करने वाला कार्य नहीं किया है , कि लोग मुख्यमंत्री की बातों को मानने लगें ,कि सत्ता में आते ही उन्होने सारे प्रदेश को चमन बनाने की कोई करामात कर दिखाई है | वास्तव में धरातल की सच्चाई यह है कि अभी भी अस्पतालों और स्वास्थ्य संस्थानों में डाक्टर और स्टाफ नहीं है और पिछली अब्यवस्था निरंतर जारी है , अभी भी स्कूलो में अध्यापक और सुविधाएं नहीं हैं और विदद्यार्थी पेड़ों के साये और कड़ाके की ठंड , धूप , वर्षा और तूफान में साल भर आधी अधूरी शिक्षा प्राप्त करने को विवश हैं जबकि सड़कों ,रास्तों की दुर्दशा पूर्व की भांति दयनीय बनी हुई है, जिससे दुखी होकर प्रदेश की जनता ने वर्ष 2014 में बड़ी ही आशाओं के साथ भाजपा को सत्ता के सिहासन पर बिठाया था |
उधर पर्यवेक्षक यह भी कहते हैं

कि राज्य सरकार के मुख्यमंत्री ने भले ही इस एक वर्ष में सभी विधान सभा क्षेत्रों का दौरा कर लिया है , लेकिन ऐसे तूफानी दौरों से लोगों की समस्याएँ नहीं सुलझती है और न ही लच्छेदार भाषणों और आश्वासनों से ही सुलझती हैं, बल्कि धरातल पर समस्याओं को सुलझाने के लिए योजनाओं को शीघ्र- अतिशीघ्र क्रियान्वित करके लोगों को लाभान्वित करने से ही जन -आक्रोश शांत होता है |
प्रयवेक्षक उदाहरण देकर कहते हैं कि अभी तक तो पूर्व कांग्रेस मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह के रामपुर व रोहड़ू की तरह ही जयराम ठाकुर को भी मंडी और अपने गृह क्षेत्र सिराज ही दिखाई देता है और इस पिछले एक वर्ष में ही मुख्यमंत्री ने अपने गृह क्षेत्र में अरबों रुपयों की योजनाएँ आरंभ करके वहाँ वाहवाही निश्चित ही प्राप्त की है ,किन्तु हिमाचल बहुत बड़ा है जिसके अन्य शेष 11 जिले और उनके 58 विधायक हैं |
उधर पिछली बार चारों संसदीय क्षेत्रों में विजयी रहे सांसदों के प्रति भी जनता में कोई उत्साह दिखाई नहीं दे रहा है और लोग हर सांसद से यही पूछते हैं कि आपने हमारे जिला के लिए क्या क्या किया ? जबकि वर्षो पूर्व आरंभ की गई केन्द्रीय सरकार की योजनाएँ अभी भी आधी- अधूरी और सर्वेक्षणों आदि की भूल -भुलैया के बीच निरंतर लटकी चली आ रही हैं और एक भी योजना ऐसी नहीं है जिससे लोग लाभान्वित हो रहे हों |
उधर अब जनता में “ अच्छे दिनों की आस “ लगाए बैठी जनता में भाजपा के प्रति कोई उत्साह , आकर्षण अथवा मोह शेष बचा नहीं दिख रहा है जबकि भाजपा के बड़े बड़े नेता अब जनता पर कोई भी प्रभाव छोडने में सफल नहीं हो रहे हैं |
उधर केन्द्रीय हाईकमान ने कांग्रेस पार्टी के पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह और निवर्तमान पार्टी अध्यक्ष सुखविंदर सिंह सुकखू के बीच के शीत युद्ध को समाप्त करा कर कुलदीप सिंह राठोर की नए प्रधान पद पर नियुक्ति करके और सुकखू को एक सम्मानजनक पद दिए जाने का आश्वासन देकर भाजपा के लिए एक और बड़ी मुसीबत पैदा कर दी है | क्यूँ कि अब वीरभद्र सिंह ज़ोर -शोर से चुनाव मैदान में डटने को प्रस्तुत दिख रहे हैं , जिनका भीड़ को प्रभावित करने और अपने जादुई भाषण से लोगों को बांध कर अपनी इच्छा अनुसार चलाने की महारत हासिल है |
पर्यवेक्षकों का मानना है कि वीरभद्र सिंह के तूफानी दौरों और चुनावी अभियानों का मुक़ाबला करने की क्षमता भाजपा में सिवा पूर्व केन्द्रीय मंत्री पंडित सुखराम के सिवा किसी और में नहीं है ,किन्तु उन्हें तो भाजपा पहले ही मंडी के टिकट के विषय में नाराज किए बैठी है |

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